
कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने इजरायल को “रंगभेदी राज्य” बताते हुए अमेरिकी सैन्य सहायता पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है। यह बयान ऐसे वक्त आया है जब अमेरिका पहले से ही ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में गहराई तक उतर चुका है।
न्यूसम का यह स्टैंड डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर उबलते असंतोष का संकेत है। सवाल यह है क्या अमेरिका की विदेश नीति अब चुनावी मैदान का हथियार बन चुकी है?
सीनेट की मुहर: ट्रंप को ‘ओपन लाइसेंस’
अमेरिकी सीनेट में प्रस्ताव गिरने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखने की खुली छूट मिल गई है। 53-47 के वोट ने यह साफ कर दिया कि वॉशिंगटन फिलहाल पीछे हटने के मूड में नहीं है। यह फैसला सिर्फ एक संसदीय प्रक्रिया नहीं—यह मिडिल ईस्ट में लंबी लड़ाई की आधिकारिक एंट्री है।
ईरान की मिसाइलें, इजरायल के बंकर
ईरान ने इजरायल पर दर्जनों मिसाइलें दागीं। जवाब में इजरायली एयरफोर्स हाई अलर्ट पर है। नागरिक बंकरों में छिपे हैं, एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय है और दोनों तरफ से बयानबाज़ी बारूद में चिंगारी डाल रही है।
तेहरान की धमकी “डिमोना न्यूक्लियर सेंटर अगला निशाना हो सकता है” ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी है।

लेबनान से हॉर्मुज तक: जंग का दायरा बढ़ा
लेबनान में हिजबुल्लाह के हमलों के बाद इजरायल ने जवाबी एयरस्ट्राइक की। दर्जनों मौतें, सैकड़ों घायल और हजारों विस्थापित। उधर हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाज पर हमला और सऊदी अरामको पर ड्रोन अटैक ने तेल बाजार में बेचैनी बढ़ा दी है। यह अब दो देशों की जंग नहीं पूरे क्षेत्र का ज्वालामुखी है।
ट्रंप की लोकप्रियता पर असर?
ताजा सर्वे के मुताबिक 57% अमेरिकी नागरिक राष्ट्रपति ट्रंप के कामकाज से असंतुष्ट हैं। आर्थिक दबाव और युद्ध का खर्च दोनों मिलकर घरेलू राजनीति को अस्थिर कर रहे हैं। एक तरफ “अमेरिका फर्स्ट” का नारा, दूसरी तरफ युद्ध का विस्तार यह विरोधाभास 2026 की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
ईरान में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेज हैं। इजरायल ने साफ कर दिया है कि “नया चेहरा भी टारगेट होगा।” इस बयानबाज़ी के बीच NATO देश सतर्क हैं, खाड़ी देश अलर्ट पर हैं और वैश्विक तेल आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है। यह सिर्फ जंग नहीं—यह पावर री-ड्रॉइंग है, जिसमें हर देश अपनी नई लाइन खींच रहा है।
Bombs Fall, Qom Stands: जब सायरन बजे, इंसानियत लाइन में खड़ी मिली
